जबलपुर में नगर निगम का अनूठा प्रयोग: मंदिरों और घरों की पूजन सामग्री से बनेगी अगरबत्ती और जैविक खाद, मातृशक्ति को मिलेगा रोजगार
रिपोर्टर: हिमांशु | The Tathya News | Jabalpur
जबलपुर। एक ओर जहां शहर की सड़कों पर ट्रैफिक का बुरा हाल है, वहीँ दूसरी ओर नगर निगम ने एक ऐसा कदम उठाया है जो पर्यावरण, महिला सशक्तिकरण और धार्मिक आस्था तीनों को जोड़ता है। नगर निगम जबलपुर ने रानीताल क्षेत्र के प्रसिद्ध हनुमान मंदिर से एक नई योजना की शुरुआत की है, जिसके तहत अब मंदिरों और घरों की पूजन सामग्री से अगरबत्ती, धूपबत्ती और ऑर्गेनिक खाद तैयार की जाएगी।
इस योजना के तहत दो इलेक्ट्रिक व्हीकल और एक कम्पोस्ट प्लांट का शुभारंभ किया गया है। ये वाहन शहर के विभिन्न इलाकों में घूम-घूम कर मंदिरों और नागरिकों के घरों से पूजा में बची सामग्री एकत्रित करेंगे। यह न केवल धार्मिक अपशिष्टों के सही निपटान की दिशा में एक क्रांतिकारी पहल है, बल्कि इससे जल स्रोतों में पूजा सामग्री के प्रवाह को भी रोका जा सकेगा — जो कि अब तक एक बड़ी पर्यावरणीय चिंता रही है।
बरेली जैसा उदाहरण जबलपुर में, लेकिन नीयत कितनी साफ?
इससे पहले उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के आंवला नगर पालिका ने भी ऐसी ही पहल शुरू की थी, जहाँ पूजा सामग्री को इकट्ठा कर निस्तारण के लिए भेजा जा रहा है। वहां यह कार्य पूरे प्रशासनिक प्लानिंग और जनभागीदारी के साथ चलाया जा रहा है। अब जब जबलपुर जैसे बड़े और संस्कृति से संपन्न शहर में यह प्रयास शुरू हुआ है, तो सवाल उठता है — क्या जबलपुर में भी यह योजना लंबी दूरी तय करेगी या फिर कागजों तक ही सीमित रह जाएगी?
सवाल भी हैं: क्या जनता तक पहुँचेगा संदेश?
नगर निगम द्वारा नागरिकों से अपील की गई है कि वे अपने घरों की पूजन सामग्री को मंदिरों के पास रखे गए विशेष डस्टबिन में ही डालें। लेकिन शहर में जगह-जगह फैली कचरे की गंदगी, अव्यवस्थित ट्रैफिक, और जन-जागरूकता की कमी के बीच क्या ये संदेश सही तरीके से आम जनता तक पहुँच पाएगा?
इस बात की भी चिंता जताई जा रही है कि कहीं ये योजना चुनावी घोषणाओं और प्रचार की भेंट ना चढ़ जाए। क्योंकि जब शहर की बुनियादी समस्याएँ जैसे सड़कें, ट्रैफिक, सफाई आदि अभी तक सही ढंग से नहीं सुलझ पाईं, तो इस नई पहल को भी व्यवहारिक रूप से लागू करने में बड़ी चुनौतियाँ सामने आ सकती हैं।
महिलाओं को मिलेगा नया रोजगार
हालांकि इस योजना का एक सबसे सकारात्मक पहलू यह है कि इससे स्व-सहायता समूह की महिलाओं को अगरबत्ती और धूपबत्ती निर्माण का कार्य दिया गया है। संस्कारधानी की ये महिलाएँ न केवल रोजगार से जुड़ेंगी, बल्कि उन्हें एक आत्मनिर्भरता की राह भी मिलेगी। महिला सशक्तिकरण की दिशा में यह एक ठोस कदम माना जा सकता है।
पूजा का सम्मान या ‘कचरा प्रबंधन’?
पूजन सामग्री को डस्टबिन में डालने की अपील ने कुछ धार्मिक संगठनों में असहजता भी पैदा की है। कुछ का मानना है कि पूजा की वस्तुओं को “कचरा” के रूप में देखने की बजाय उनका सम्मानपूर्वक निस्तारण जरूरी है। यही वह बारीक लाइन है, जहां प्रशासन को बेहद संवेदनशील और संतुलित तरीके से कार्य करने की आवश्यकता होगी।
अंत में: पहल सही, पर दिशा और प्रबंधन पर उठते सवाल
नगर निगम जबलपुर की यह पहल निश्चित रूप से एक प्रेरणादायक मॉडल बन सकती है, बशर्ते इसे ईमानदारी और जन-सहभागिता के साथ लागू किया जाए। वरना यह भी कई सरकारी प्रयासों की तरह दिखावटी बनकर रह जाएगी।
अब देखना यह होगा कि नगर निगम इस योजना को स्थायी, व्यवहारिक और व्यावसायिक मॉडल में बदल पाता है या नहीं।
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