मध्य प्रदेश की धरती पर शिक्षक भर्ती वर्ग-1 (2023) का नाटक अभी भी जारी है, और इस बार पात्र अभ्यर्थियों ने अपनी व्यथा सुनाने के लिए खून का रास्ता अख्तियार किया है। यह सिर्फ एक भर्ती का मामला नहीं, बल्कि लाड़ली बहनों के उन सपनों की चीख है, जिन्हें सरकारी फाइलों में कैद कर दिया गया है। एक तरफ “मोहन भैया” लाड़ली बहनों को वित्तीय सहायता का वादा करते हैं, वहीं दूसरी तरफ ये “लाड़ली बहनें” अपने ही खून से खत लिखकर कहती हैं, “हमें सहायता नहीं, हमारा अधिकार चाहिए!” क्या खूब विडंबना है|

खून से लिखी दास्तान: दर्द और व्यंग्य का संगम
जब कलम की स्याही सूख जाए और आवाज़ बेअसर हो जाए, तब खून ही आखिरी सहारा बनता है। मध्य प्रदेश की इन भावी शिक्षिकाओं ने भी यही किया। इंजेक्शन से अपना खून निकालकर मुख्यमंत्री को लिखा गया यह पत्र सिर्फ स्याही नहीं, बल्कि उनके सालों की मेहनत, उनकी बर्बाद होती उम्र, और उनके टूटते सपनों का लाल रंग है। पत्र में “मोहन भैया” का संबोधन एक मर्मस्पर्शी पुकार है, जो यह सवाल करती है कि क्या ये सिर्फ चुनावी वादों की लाड़ली बहनें हैं या उनके दर्द को भी समझा जाएगा? पिछले साल राखी पर दिया गया “ख्याल रखने” का संदेश आज मजाक बनकर रह गया है, जब सैकड़ों योग्य अभ्यर्थी बेरोजगार घूम रहे हैं।
खाली पद और खोखले दावे: एक सरकारी मज़ाक
कुल 8720 पदों में से सिर्फ 5053 पर नियुक्ति, और 2901 पद अभी भी खाली! क्या यह सरकारी कार्यप्रणाली की दक्षता का प्रतीक है या उसकी घोर उपेक्षा का? अभ्यर्थियों का चयन सूची में नाम आ गया, लेकिन उन्हें नियुक्ति नहीं मिली। यह ऐसा है, जैसे प्यासे को कुएं तक ले जाकर भी पानी न पीने देना।
और तो और, जब शिक्षा विभाग दिसंबर 2024 में 48,223 और जनजातीय कार्य विभाग 10,501 नए शिक्षकों के पद स्वीकृत कर सकता है, तो पुराने वेटिंग वालों को क्यों नज़रअंदाज़ किया जा रहा है? क्या नए पद स्वीकृत करना सिर्फ कागजी कार्यवाही है, जबकि पुराने योग्य अभ्यर्थियों को नियुक्ति देना बोझ लगता है? यह सरकारी दफ्तरों में बैठी मानसिकता पर एक करारा व्यंग्य है – “नया माल नया, पुराना माल कचरा!”
परंपरा टूटी, सपने टूटे: द्वितीय काउंसलिंग का सस्पेंस
संघ के अध्यक्ष निलेश गौतम बताते हैं कि 2011 और 2018 में द्वितीय काउंसलिंग के जरिए नियुक्तियां हुई थीं, लेकिन 2023 में इस परंपरा को तोड़ दिया गया। क्या यह “नई परंपरा” सिर्फ योग्य अभ्यर्थियों को बेरोजगार रखने के लिए बनाई गई है? सरकारी स्कूलों में बच्चों के भविष्य का क्या होगा, जब योग्य शिक्षक बाहर बैठे अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं?
यह मामला सिर्फ नौकरियों का नहीं है, यह आत्म-सम्मान, न्याय और सरकारी वादों की विश्वसनीयता का है। क्या मध्य प्रदेश सरकार इन खून से लिखे पत्रों का जवाब देगी, या ये भी किसी पुरानी फाइल की धूल में दब जाएंगे? इन लाड़ली बहनों के हक की आवाज़ कब सुनी जाएगी?