नियमों की लाचारी, बिल्डर की मिठाई और महापौर की मेहरबानी

शहर की सड़कों पर पार्किंग की समस्या पर नगर निगम भले ही आम लोगों के चालान काटता हो, लेकिन जब सवाल रसूख वाले बिल्डर पर आया — तो नियमों की चाबी महापौर की जेब में निकली।यह घटना सिर्फ एक दुकान पर लगे ताले की नहीं, बल्कि प्रशासन के आत्मसमर्पण की कहानी है।

कॉम्प्लेक्स की अव्यवस्था, बार-बार नोटिस, फिर कार्रवाई

रेलवे स्टेडियम के सामने एक बड़े शॉपिंग कॉम्प्लेक्स की दुकानों के बाहर अवैध पार्किंग की वजह से यातायात बाधित हो रहा था।नगर निगम ने बिल्डर शंकर मंछानी को कई बार नोटिस दिए। जब कोई असर नहीं हुआ, तो शुक्रवार को ‘नेचर्स’ नामक दुकान पर लाल निशान लगाकर शटर गिराया गया।लेकिन कार्रवाई वहीं ठहर गई — जब बिल्डर ने कहा:> “लो, महापौर से बात करो।

फ़ोन कॉल से बदल गया प्रशासन का रुख

जैसे ही महापौर से बात होने का हवाला दिया गया, नगर निगम की टीम का सख्त रवैया अचानक नरम पड़ गया।मीडिया कैमरे ऑन थे — ऐसे में बात को संभालना ज़रूरी हो गया।इसी बीच मौके पर मौजूद अधिकारियों ने खुद ही शटर वापस खोला और कहा:> “यह कार्रवाई सिर्फ चेतावनी थी, सांकेतिक थी।”

मिठाई की दुकान में सजी ‘बैठक’, बाहर खुला ताला

कुछ ही देर में महापौर जगत बहादुर सिंह अन्नू खुद वहां पहुंचे।जिस दुकान को सील किया गया था, उसके बाजू की मिठाई की दुकान में महापौर, बिल्डर और निगम अधिकारियों की बंद कमरे में बातचीत हुई।बातचीत के चंद मिनट बाद ही ताला खोल दिया गया।आखिर मिठाई की दुकान में चर्चा क्यों हुई — और ताले पर फैसला कैसे पलट गया — इसका जवाब न निगम के पास था, न प्रशासन के पास।

लोकतंत्र के नाम पर लीपा-पोती

महापौर के बाहर निकलने के बाद निगम अधिकारियों ने कैमरे पर बयान दिया:> “ताला प्रतीकात्मक था, किसी भी प्रकार की सीधी कार्रवाई नहीं की गई।”लेकिन इस ‘प्रतीकात्मकता’ ने स्पष्ट कर दिया कि प्रशासन कानून नहीं, दबाव से चलता है।

3 अहम बिंदु जो इस प्रकरण को गंभीर बनाते हैं:

1. बार-बार नोटिस और शिकायतों के बावजूद बिल्डर ने अव्यवस्था नहीं सुधारी।

2. महापौर की मौजूदगी ने कार्रवाई का पूरा स्वरूप बदल दिया।

3. जनता के सामने व्यवस्था की असली सूरत उजागर हुई — जो ताकतवर के आगे झुकती है।

इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया कि कानून वही है जिसे सत्ता स्वीकार करे।जब एक रसूखदार के लिए ताले टूट जाएं और कार्रवाई ‘चेतावनी’ बन जाए,तो असली चेतावनी तो जनता के लोकतांत्रिक भरोसे को मिलती है।> एक ओर जनता है, जो हर दिन सिस्टम से जूझती है,दूसरी ओर रसूख है, जो एक कॉल पर पूरा सिस्टम बदल देता है।

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