घोड़े पर सवार गणपति का चमत्कार: जबलपुर के इस मंदिर में ‘कल्कि गणेश’ पूरी करते हैं हर अर्जी, आस्था का अद्भुत केंद्र
जबलपुर, 26 अगस्त, 2025: क्या आपने कभी भगवान गणेश को चूहे की सवारी के बजाय घोड़े पर विराजमान देखा है? अगर नहीं, तो जबलपुर के सुप्तेश्वर गणेश मंदिर आइए, जहाँ भगवान गणेश अपने कल्कि अवतार में पूजे जाते हैं और उनकी स्वयंभू प्रतिमा भक्तों के लिए आस्था का अद्भुत केंद्र बन चुकी है। यह मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि चमत्कार, विश्वास और प्रकृति का एक बेमिसाल संगम है, जो हर किसी को अपनी ओर खींच लेता है।

मंदिर की स्थापना: एक सपना, एक चमत्कार
इस मंदिर की कहानी किसी स्वप्न से कम नहीं है। प्रेम नगर में रहने वाली सुधा अविनाश राजे नामक एक बुजुर्ग महिला को स्वप्न में भगवान गणेश ने दर्शन दिए। उन्हें एक विशाल शिला पर भगवान की छवि दिखी और उन्होंने तुरंत 4 सितंबर 1989 को गंगा जल एवं नर्मदा जल से उस शिला का अभिषेक कर सिंदूर और घी चढ़ाकर पूजा शुरू कर दी। धीरे-धीरे यह जगह प्रसिद्ध होती गई और लोगों की मन्नतें पूरी होती गईं, जिससे यहाँ आने वाले भक्तों की संख्या लगातार बढ़ती गई। भक्तों की बढ़ती आस्था को देखते हुए 2009 में सुप्तेश्वर विकास समिति का गठन किया गया, जिसके बाद मंदिर ने भव्य स्वरूप ले लिया।
कल्कि गणेश का विशाल स्वरूप: आस्था जो पाताल तक समाई है
सुप्तेश्वर गणेश मंदिर की सबसे खास बात यहाँ की प्रतिमा है, जिसमें भगवान गणेश अपने वाहन चूहे के बजाय घोड़े पर सवार हैं। यह देश का शायद इकलौता मंदिर है, जहाँ भगवान गणेश की पूजा कल्कि अवतार के रूप में होती है। यहाँ स्थित भगवान की प्रतिमा काफी विशाल है, और कहा जाता है कि यह शिला पाताल तक समाई हुई है। धरती के बाहर तो सिर्फ उनकी विशाल सूंड नजर आती है, बाकी पूरा शरीर धरती के अंदर है। यह मंदिर करीब 50 फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। मंदिर में कोई गुंबद या दीवार नहीं है, और भक्त सीधे प्राकृतिक पहाड़ी में ही भगवान के दर्शन करते हैं।

अर्जी, सिंदूर और अनोखे अनुष्ठान
यहाँ आने वाले भक्त अपनी मनोकामनाओं के लिए भगवान के सामने अर्जी लगाते हैं। मान्यता है कि जो भक्त 40 दिन तक नियमित रूप से पूजा-अर्चना करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। मनोकामना पूरी होने पर, वे भगवान गणेश को सिंदूर चढ़ाते हैं और झंडा अर्पित करते हैं। मंदिर के पुजारी मदन तिवारी के अनुसार, साल भर में तीन माह में एक बार सिंदूर चढ़ाने की रस्म अदा की जाती है। इसके अलावा, गणेश चतुर्थी के 11 दिन के उत्सव में यहाँ विशेष पूजा का विधान है, साथ ही श्रीराम नवमी और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी जैसे बड़े पर्वों पर भी यहाँ भक्तों की भीड़ उमड़ती है। मंदिर की देखरेख का जिम्मा जबलपुर के तहसीलदार के पास है।
यह मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक ऐसा चमत्कार है जो हर भक्त को अपनी ओर खींचता है, और जहाँ आस्था और प्रकृति का मेल एक अद्भुत अनुभव देता है।
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