बिजली दर वृद्धि का विरोध: विशेषज्ञों ने 6,044 करोड़ के घाटे को बताया फर्जी, दावा—15% तक घट सकते हैं दाम

जबलपुर/भोपाल। मध्यप्रदेश में एक अप्रैल 2026 से बिजली की दरों में प्रस्तावित 10.19 प्रतिशत की बढ़ोतरी को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। विद्युत विशेषज्ञों ने न सिर्फ इस वृद्धि का कड़ा विरोध किया है, बल्कि आंकड़ों के साथ यह साबित करने का दावा किया है कि बिजली कंपनियों द्वारा दिखाया गया घाटा पूरी तरह गलत है।

घाटे के बजाय 9,125 करोड़ का सरप्लस

सेवानिवृत्त एडिशनल चीफ इंजीनियर एडवोकेट राजेंद्र अग्रवाल और राजेश चौधरी ने मध्यप्रदेश विद्युत नियामक आयोग के समक्ष 16 बिंदुओं पर आधारित विस्तृत आपत्ति दर्ज कराई है। उनके अनुसार, मध्यप्रदेश पावर मैनेजमेंट कंपनी और तीनों विद्युत वितरण कंपनियों द्वारा दिखाया गया 6,044 करोड़ रुपये का घाटा वास्तव में अधूरी और त्रुटिपूर्ण मान्यताओं पर आधारित है। विशेषज्ञों की गणना के अनुसार, कंपनियों के पास 9,125 करोड़ रुपये का सरप्लस है।

तीन बड़ी विसंगतियां उजागर

1. नौ बार खारिज हो चुका बिल फिर घुसेड़ा गयाविशेषज्ञों ने खुलासा किया कि 3,450.63 करोड़ रुपये का पूरक बिजली खरीद बिल, जिसे नियामक आयोग पहले ही नौ बार खारिज कर चुका है, उसे बार-बार घाटे में जोड़कर दरें बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।

2. स्मार्ट मीटर का बोझ उपभोक्ताओं परस्मार्ट मीटर के लिए मांगे गए 821 करोड़ रुपये को भी नियमों के विरुद्ध बताया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह खर्च कंपनियों को वहन करना चाहिए, न कि उपभोक्ताओं पर डाला जाए।

3. GST क्रेडिट का लाभ छुपाया गयाराजेंद्र अग्रवाल ने बताया कि बिजली इनपुट पर जीएसटी दर 5 प्रतिशत से बढ़कर 18 प्रतिशत होने से कंपनियों को इनपुट टैक्स क्रेडिट का लाभ मिल रहा है, जिससे प्रति यूनिट लागत में करीब 25 पैसे की कमी आनी चाहिए। लेकिन इस लाभ को प्रस्तावित दरों में शामिल नहीं किया गया।

कोयला सरचार्ज समाप्ति का फायदा भी नहीं दिया

केंद्र सरकार द्वारा कोयला सरचार्ज समाप्त किए जाने के बावजूद इसका लाभ उपभोक्ताओं को नहीं दिया जा रहा है। विशेषज्ञों ने इसे भी गंभीर अनियमितता बताया है।

15% तक घट सकती हैं दरें

विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि यदि विद्युत नियामक आयोग विद्युत अधिनियम 2003 के प्रावधानों और अपने स्वयं के नियमों का सख्ती से पालन कराए, तो न केवल दरें बढ़ाने की जरूरत नहीं है, बल्कि इन्हें 15 प्रतिशत तक घटाया जा सकता है। इससे मध्यप्रदेश की बिजली दरें छत्तीसगढ़ और गुजरात के बराबर लाई जा सकती हैं।

व्यक्तिगत सुनवाई की मांग

विशेषज्ञों ने नियामक आयोग से इन 16 गंभीर बिंदुओं पर विस्तृत विवरण देने के लिए व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर देने का अनुरोध किया है। आयोग ने उपभोक्ताओं से आपत्तियां 25 जनवरी 2026 तक आमंत्रित की थीं।यह मामला अब उपभोक्ताओं के हित में एक अहम मोड़ पर है, जहां नियामक आयोग के फैसले से तय होगा कि प्रदेश की जनता पर बिजली का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा या उन्हें राहत मिलेगी।


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