सुप्रीम कोर्ट में ओबीसी आरक्षण पर संग्राम: MPPSC के ‘याचिका खारिज’ करने के जवाब से बढ़ा विवाद, सरकार ने दिया ‘होल्ड’ का तर्क
जबलपुर, 26 अगस्त, 2025: मध्यप्रदेश में ओबीसी आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट में छिड़ा विवाद अब अपने निर्णायक मोड़ पर पहुँच रहा है। आगामी 22 सितंबर को होने वाली सुनवाई से पहले ही, मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) और राज्य सरकार द्वारा दाखिल किए गए जवाबी हलफनामों ने ओबीसी अभ्यर्थियों की बेचैनी और बढ़ा दी है। खासकर, आयोग के सीधे रुख ने इसे एक बड़े विवाद का रूप दे दिया है।
पूरे विवाद की जड़: क्या है WP 606/2025 याचिका?
यह पूरा मामला ओबीसी अभ्यर्थियों द्वारा दायर याचिका क्रमांक WP 606/2025 से जुड़ा है। इस याचिका में, अभ्यर्थियों ने सुप्रीम कोर्ट से 27% ओबीसी आरक्षण को लागू करने और पिछले परिणामों में होल्ड किए गए 13% पदों को नियमित करने की मांग की है। इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई 22 सितंबर से शुरू होनी है।
MPPSC का चौंकाने वाला रुख: याचिका को ‘खारिज’ करने की मांग
आयोग की ओर से उप परीक्षा नियंत्रक सुशांत पुनेकर ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल किया है। इसमें MPPSC ने याचिकाकर्ताओं की अपील को सीधे तौर पर खारिज करने की मांग की है, यह कहते हुए कि इस याचिका में “कोई दम नहीं है”।
- ‘समयपूर्व’ का तर्क: आयोग ने दलील दी कि यह याचिका समयपूर्व (premature) है, क्योंकि ओबीसी आरक्षण से जुड़ा मूल मामला पहले से ही मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में विचाराधीन है।
- भर्ती एजेंसी होने का दावा: MPPSC ने खुद को सिर्फ एक ‘भर्ती एजेंसी’ बताया, जो केवल राज्य सरकार के निर्देशों के अनुसार चयन प्रक्रिया को अंजाम देती है।
- मौलिक अधिकार पर सवाल: आयोग के अनुसार, याचिकाकर्ताओं का यह कहना कि उनके मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है, अभी ‘काल्पनिक और अपरिपक्व’ है।
वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर ठाकुर ने MPPSC के इस रुख पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि आयोग को एक तटस्थ एजेंसी के रूप में काम करना चाहिए था, लेकिन याचिका खारिज करने की मांग करके उसने अपनी तटस्थता छोड़कर ‘ओबीसी विरोधी रुख’ अपना लिया है।
राज्य सरकार का पक्ष: ‘13% होल्ड’ को क्यों किया गया?
वहीं, राज्य सरकार ने अपने जवाब में 13% पदों को होल्ड करने की अपनी व्यवस्था का बचाव किया है।
- हाईकोर्ट का पालन: सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 29 सितंबर 2022 की अधिसूचना पूरी तरह से मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश का पालन करते हुए ही जारी की गई थी।
- ‘न्याय’ का सिद्धांत: सरकार ने दलील दी है कि यह व्यवस्था उचित वर्गीकरण और न्याय के सिद्धांत (reasonable classification and intelligible differentia) पर आधारित है, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी अभ्यर्थी को उसकी सामाजिक स्थिति के कारण अतिरिक्त लाभ या नुकसान न हो। सरकार ने इस संदर्भ में “अज्ञानता का पर्दा (Veil of Ignorance)” की अवधारणा का भी उल्लेख किया।
- अभ्यर्थियों के भविष्य की सुरक्षा: सरकार का कहना है कि अगर यह व्यवस्था नहीं की जाती, तो 2020 और 2022 की परीक्षाओं में शामिल हजारों अभ्यर्थियों की नियुक्तियां सालों तक अटकी रहतीं। इसलिए, सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि याचिकाकर्ताओं को कोई भी अंतरिम या मुख्य राहत न दी जाए।
यह मामला अब कानूनी और राजनीतिक दोनों ही स्तरों पर गरमा गया है, और सभी की निगाहें 22 सितंबर से शुरू होने वाली सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं।
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